16 September 2021

तालिबान और भारतीय लिबरल

 आतंकवादी तालिबान का अफ़गानिस्तान पर वर्चस्व पूरे विश्व के लिये चिन्ता का विषय बना है... परन्तु उससे भी अधिक चिन्ताजनक बात यह है कि भारत के तथाकथित लिबरल, साम्यवादी तथा सेक्कुलर लोग तालिबान का भूल कर भी विरोध नहीं कर रहे हैं....! यहाँ के तथाकथित "शान्तिप्रिय" समुदाय के लोग अपने साम्प्रदायिक भाईचारे (उम्मा, Muslim Brotherhood) के कारण तालिबानियों के आतंकवादी हिंसाचार तथा अलोकतान्त्रिक व्यवहार का भी समर्थन कर सकते हैं, परन्तु ऐसी क्या बात है कि यहाँ के तथाकथित लिबरल, साम्यवादी तथा सेक्कुलर लोग तालिबान के विरोध में एक अक्षर भी नहीं बोलते..?

इसकी पार्श्वभूमि समझने के लिये तालिबानी विचारधारा तथा संगठन के भारतीय मूल पर दृष्टिपात करना समयोचित होगा...! कोई कोई विदेशी आतंकवादी विचारधारा है, इस भ्रम में कोई न रहे तो ही अच्छा है... इस पूरी विचारधारा का मूल भारत में ही है... यहाँ की "जमात उलेमा-इ-इस्लाम" एवं देवबन्द की कट्टरता में ही तालिबान का स्रोत छिपा है..!

"तालिब" का अर्थ है "विद्यार्थी"... परन्तु ये किसी आधुनिक विश्वविद्यालय या अभियांत्रिकी/आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के विद्यार्थी नहीं होते हैं, अपितु इस्लामी मदरसों में साम्प्रदायिक शिक्षा प्राप्त करनेवाले ही होते हैं...! जिस प्रकार सनातन भारतीय विचार-परम्परा में एवं उपासना में शैव, वैष्णव, शाक्त, सांख्य, अद्वैती आदि दर्शनों की परम्पराएँ हैं, उसी प्रकार इस्लाम में प्रमुख रूप से शिया, सुन्नी, इबादी, अहमदिया एवं सूफ़ी विचारधाराएँ प्रधान हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के सुन्नी मुसलमानों में मुख्य रूप से परम्परावादी "बरेलवी" तथा पुनरुत्थानवादी "देवबन्दी" विचारधाराओं के उगम का सम्बन्ध तो मुग़ल शासनकाल से मिलता है । एक का मुख्यालय बरेली में तो दूसरे का देवबन्द में होना उनके नामों से ही स्पष्ट है । देवबन्दी परम्परा सुन्नी हनाफ़ी मत की है और सन १८६६ में मुहम्मद कासीम तथा रशीद अहमद द्वारा देवबन्द में स्थापित इस विचारधारा का प्रभाव "जमाते उलेमा-ए-हिन्द" एवं "जमाते उलेमा इस्लाम-ए-पाकिस्तानी" पर समान रूप से है । इस्लामी पुनरुज्जीवन का एवं गज़वा-ए-हिन्द का मुख्य विचार १७६२ में निधन हुए शाह वलीउल्लाह इस इस्लामी आलिम का था । इसी शाह वलीउल्लाह ने काफ़िर मराठाओं के विरोध में इस्लामी ताकत को बढ़ाने के लिये अफ़गानी  सुलतान अहमदशहा अब्दाली को भारत में आमन्त्रित कर पानिपत के तीसरे युद्ध का सूत्रपात किया था, इसे भारत पर इस्लामी शासन के सन्दर्भ में भूला नहीं जा सकता । 

भारत पर इस्लाम का पूर्ण वर्चस्व (गज़वा-ए-हिन्द), शरीया के अनुसार कट्टर कानून, स्त्रियों का बुरक़ा, काफ़िरों (हिन्दू-सिख) की सम्पत्ति तथा स्त्रियों के अपने अधीन करना, मूर्तिपूजा का विरोध करने के लिये मन्दिरों तथा मूर्तियों को ध्वस्त करना ये इस देवबन्दी विचारधारा के मुख्य लक्ष्य हैं.... स्वाभाविक था कि इन्हीं की अफ़गानी शाखा ने बायिमान की विशाल बुद्धमूर्ति को भी तोड़ा था...! सभी तालिबानी नेता पाकिस्तान के देवबन्दी मदरसों के ही "तालिब" हैं । भारत में देवबन्द के अलावा औरंगज़ेब के समय से चले आ रहे हनाफ़ी गुट का "फ़िरंगी महल" यह भी एक धर्मपीठ है... अलीगढ़ से अलग हुए मौलाना शिबली, मौलाना नुमानी, मौलाना नदवी आदि द्वारा लखनौ में बनाया गया नवदत्-उल्-उलेमा भी एक इस्लामी धर्मपीठ है, परन्तु सर्वाधिक महत्त्व तथा सम्मान तो देवबन्द को ही मिलता है...!

वर्तमान में भारत के लगभग १५% मुसलमान इसी देवबन्दी विचार के अनुयायी हैं । स्वतन्त्रता संग्राम के काल में अपनी कुछ माँगे मनवाने के लिये देवबन्दियों ने काँग्रेस को सहयोग दिया था, इतने भर के लिये उन्हें "राष्ट्रीय मुसलमान" मानने की भूल की जाती है...! केरल में मोपलाओं ने दंगा भड़का कर हज़ारो हिन्दुओं की हत्या की, तब यही देवबन्दी उलेमाओं ने उनका समर्थन किया.... स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा अब्दुल रशीद इनके लिये "जिहादी" था...! कभी "राष्ट्रवादी" काँग्रेसी कहे जानेवाले मौलाना मुहम्मद अली बाद में मुस्लिम लीग में जा कर कहते हैं "एक फटेहाल चारित्र्यहीन मुसलमान भी मेरी दृष्टि में केवल मुसलमान होने के कारण गांधीजी से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि गांधी मुसलमान तो हैं नहीं..!" 

सन १९२३ के काकीनाडा काँग्रेस अधिवेशन में मौलाना मुहम्मद अली ने कहा कि हिन्दुस्तान में हिन्दुओं और मुस्लिमों के वर्चस्वक्षेत्रों को पहचान कर उन्हें उस धर्म के वर्चस्व के आधार पर स्वतन्त्र किया जाय और ऐसे अनेक राज्य इकट्ठा हो कर भारत का संघराज्य बनायें, लेकिन वह United States न हो कर United Faiths होना चाहिये...! अहरार नेता ताजुद्दिन अन्सारी, अताउल्ला शहा बुखारी, जमियत-उल्-उलेमा के नेता मौ. अबुल हसनात्, मो. अहमद अली, मौ. अब्दुल हमीद बदायुनी ये सभी एक बात पर सहमत थे कि भारतीय मुसलमानों का  भारत के साथ एकनिष्ठ रहना सम्भव नहीं है..!

स्वतन्त्रता संग्राम में दिखावे के लिये "राष्ट्रवादी" बने सभी देवबन्दी उलेमाओं एवं नेताओं को भारत केवल मुसलमानों का देश बनाना था...! आज अफ़गानिस्तान पर वर्चस्व स्थापित करनेवाले सभी तालिबानी इसी हनाफ़ी देवबन्दी गुट के मदरसों के "तालिब" हैं, अत: उनके मन में भारत पर इस्लाम का पूर्ण वर्चस्व (गज़वा-ए-हिन्द) यह लक्ष्य के रूप में हमेशा बना रहेगा...!

आजकल के साम्यवादी, तथाकथित उदारतावादी लिबरल तथा सेक्कुलर लोगों को भारत का एक संगठित, सशक्त एवं सार्वभौम राष्ट्र बन कर उभरना सहन नहीं होता है... और पिछले सात वर्षों में नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में हो रहा हिन्दुओं का धार्मिक तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान तो इन लिबरलों तथा सेक्कुलरों के पेटदर्द का सबसे बड़ा कारण बना है । पिछले सत्तर वर्षों में तो इन्हीं लोगों ने पाठ्यक्रम की पुस्तकों तक से भारत में हिन्दु वर्चस्व का कालखण्ड ऐसे गायब कर दिया कि मौर्यकाल के बाद भारत के इतिहास में एकदम बारहसौ वर्ष बाद का मुगल काल पढ़ाया जाता है... बीच का कर्कोट, चोल, पाण्ड्य, वाकाटक, गुर्जर, प्रतिहार, अहोम, मराठा आदि साम्राज्यों का इतिहास तो २-४ पन्नों में ही सिमट कर रह गया है...! परन्तु आज पुन: भारत में हिन्दुओं को सांस्कृतिक तथा धार्मिक रूप से सजग तथा जागृत होता देख कर सभी लिबरलों तथा सेक्कुलरों की नींद उड़ गयी है....! 

स्वाभाविक है कि तालिबानियों को भले ही सारी दुनिया आतंकवादी, अत्याचारी तथा लोकतन्त्रविरोधी कहती हो, तो भी भारत के सभी लिबरल तथा सेक्कुलर लोग तालिबान के समर्थन में जुटे दिखायी देते हैं.... केवल इसलिये कि देवबन्दी मदरसों के विद्यार्थी रहे तालिबानियों के लिये "गज़वा-ए-हिन्द" यह एक महत्त्वपूर्व लक्ष्य है...!

- स्वामीजी १६ सितम्बर २०२१

27 August 2021

सम्पत्ति का मुद्रीकरण Asset Monetisation

 आजकल अपनी बुद्धि गिरवी रखे हुए कई लोग बिना सोचे-समझे और बिना कुछ जाने एक ही हल्ला मचा रहे हैं कि प्रधानमन्त्री मोदी देश के रेल्वे स्टेशन, सड़के, हवाईअड्डे, बन्दरगाह, सरकारी गोदाम, स्टेडियम सब कुछ "बेच रहे हैं"...! खैर, जब इन लोगों की बुद्धि गिरवी पड़ी है, तब वे समझेंगे कैसे और जानेंगे भी क्या..?

परन्तु सामान्य व्यक्ति के लिये यह समझना आवश्यक है कि मोदी सरकार की National Monetization Pipeline (एनएमपी) योजना वास्तविक रूप से क्या है..?

★ अगले चार वर्षों में कम से कम ₹ ६ लाख करोड़ प्राप्त करानेवाली इस महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP) की घोषणा वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण ने की है।

★ निजी क्षेत्र की कम्पनियों से अग्रिम धनराशि लेकर उन प्रकल्पों का स्वामित्व सरकार के ही पास रख कर (पुन: बताऊँ कि उन प्रकल्पों का स्वामित्व सरकार के ही पास रख कर) उनसे जनसामान्य से पाने योग्य सेवाशुल्क, कर और लागत का अंश वसूल करने के अधिकार इन निजी कम्पनियों को हस्तान्तरित करने की यह एक आसान व्यवस्था है।

★ ऐसी व्यवस्था भारत में आज पहली बार नहीं लायी जा रही है... Operate Maintain Transfer (OMT), Toll Operate Transfer (TOT), Operations, Maintenance & Development (OMD) ऐसी तीन पद्धतियों से भारत सरकार के सैंकड़ों प्रकल्पों का Monetization अटलबिहारी बाजपेयी एवं मनमोहन सिंग के कार्यकाल में हुआ है...!

★ पूरे देश में विशेषत: राष्ट्रीय महामार्गों पर बने टोल नाकों पर OMD और TOT पद्धति से टोल वसूली के ठेके पिछले दो दशकों से दिये जा रहे हैं.... देश के बहुत से बड़े हवाईअड्डों के रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन का दायित्व OMD पद्धति से कई कम्पनियों को दिया जाता रहा है..!

★ संक्षेप में कहें तो उन प्रकल्पों से सरकार को अगले २०-२५ वर्षों तक हो सकनेवाली आमदनी को इन कम्पनियों से अग्रिम ले कर उन्हें वे प्रकल्प व्यावसायिक ढंग से चलाने के लिये जाते हैं... कंपनी ने सरकार को अग्रिम दी धनराशि से अधिक कमाई वह कम्पनी कर ले तो वह उसका लाभ होगा, लेकिन नियमित रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन तथा सेवारत कर्मचा्रियों का वेतन आदि व्यय करने के उपरान्त पैसा न बचे तो कम्पनी को वह घाटा भी सहना पड़ेगा...!

★ तय की गयी कालावधि के पश्चात्‌ चाहे तो सरकार स्वयं उस प्रकल्प के नियमित रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन का जिम्मा उठाये या फिर किसी कम्पनी को आगे की अवधि के लिये अग्रिम धनराशि ले कर अगला ठेका दे दे । 

★ इतना सब होने पर भी उन प्रकल्पों के स्वामित्व का पूरा अधिकार भारत सरकार के पास ही रहता है, शुल्क की वसूली का अधिकार किसी कम्पनी को हस्तान्तरित करने पर भी स्वामित्व सरकार के पास रहता है...!

★ सब कुछ इतना सुस्पष्ट, पारदर्शी तथा आसानी से समझने योग्य होने पर भी व्यर्थ में "बेच दिया" का हल्ला मचा कर अपने मुँह के बल गिरने का ही शौक विरोधियों ने पाल रखा हो तो कोई क्या कर सकता है..? 

★ वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने दि.२३ ऑगस्ट को नया "राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाईपलाईन प्रोजेक्ट" प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार केन्द्र सरकार के स्वामित्व की और स्थापित क्षमता से कम मात्रा में उपयोग की जानेवाली भूमि-भवनादि स्थिर सम्पत्ति एवं संसाधन निजी उद्योजकों तथा उद्योग कम्पनियों को नीलामी की उचुत प्रक्रिया के उपरान्त दीर्घ अवधि के लिये किराये पर या लीज़ पर दिये जायेंगे,,, और हाँ, नीलामी केवल सरकार को दी जानेवाली अग्रिम धनराशि को निश्चित करने के लिये होगी, सरकारी सम्पत्ति/संसाधन के स्वामित्व की नहीं...! किराये/लीज़ की अवधि में वे निजी उद्योजक तथा कम्पनियाँ उस सम्पत्ति/संसाधन का उपयोग कर सकेंगे... उस अवधि में उस भूमि पर लगाये जानेवाले प्रकल्पों का निर्माण, नियमित रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन वही निजी उद्योजक करेंगे, उन प्रकल्पों को चलाने के लिये नियुक्त कर्मचारियों का वेतन, भत्ते आदि का दायित्व भी उसीउ द्योजक के कन्धों पर होगा.... ऐर उस अवधि में भी उस सम्पत्ति/संसाधन पर स्वामित्व का अधिकार सरकार का यानी देश का ही होगा... किसी को कुछ भी "बेचा" जानेवाले  नहीं है...! 

★ इस प्रकार किये जानेवाले सरकारी सम्पत्ति के मुद्रीकरण (Asset Monetisation) के कुछ लाभ तो स्पष्ट हैं....

१) सरकार को कम से कम ₹ ६ लाख करोड़ की धनराशि अग्रिम मिल जायेगी।

२) इन प्रकल्पों को चलाते समय होता रहा वित्तीय घाटा अब देश को उठाना नहीं पड़ेगा।

३) नेहरू-इन्दिरा पितापुत्री के द्वारा देश पर थोपे हुए समाजवाद एवं राष्ट्रीयकरण के चलते सरकारी नौकरियों के सुरक्षित पदों पर बैठ कर बिना कुछ काम किये मोटा वेतन लेनेवाले मुफ़्तखोर सरकारी कर्मचारियों की फ़ौज़ को आगे से पालना नहीं पड़ेगा...!

- स्वामी निश्चलानन्द

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(इस विषय को अधिक विस्तार से समझने के लिये आगे की लिंक पर उपलब्ध लेख सहाय्यकारी हो सकता है।

https://indianexpress.com/article/explained/explained-what-is-the-governments-plan-with-the-national-monetisation-pipleline-7468258/)

16 October 2020

"हॅप्पी हॅप्पी" का संकट..

 कल से नवरात्र प्रारम्भ हो रहे हैं.. आगे दशहरा-दिवाली से होली तक लगातार अनेक त्यौहार आयेंगे और ऐसे प्रत्येक पर्व-उत्सव के दिन समाज-माध्यमों में "हॅप्पी अमका दिन" "हॅप्पी तमका दिन"के सन्देशों की बाढ़ आ जायेगी। इसमें इन पर्व-उत्सवों के परम्परागत महत्त्व तथा पावनता का पूरा अनादर ही होता दिखायी देता है..!

ईसाईयों को देखिये, वे ख्रिसमस की शुभकामनाएँ देने के लिये कभी भी "हॅप्पी क्रिसमस" नहीं कहते, वे हमेशा उनकी परम्परा के अनुसार "मेरी क्रिसमस" ही कहते हैं... कोई भी मुसलमान कभी भी "हॅप्पी ईद" नहीं कहता, हमेशा "ईद मुबारक" ही कहता है... परन्तु हिन्दु ही पाश्चात्यों के आधुनिक प्रभाव में उनके अलग अलग दिन मनाते समय "हॅप्पी फलाँ दिन" "हॅप्पी ढिकला दिन" की तरह भारतीय परम्परा के पर्व-त्यौहारों पर उसी "हॅप्पी हॅप्पी" का खोटा सिक्का फेंक मारते हैं..!

कोई कहेगा कि हम तो उस दिन की शुभकामनाएँ देते हैं... परन्तु वस्तुत: हमारे अधिकांश पर्व किसी न किसी देवता की व्यक्तिगत उपासना से सम्बन्धित होते हैं, उस दिन प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने घर में या मन्दिर जाकर उस देवता की उपासना करें यही अपेक्षित है, उस दिन अन्य किसी को शुभकामनाएँ देने का प्रश्न ही नहीं उठता..! "हॅप्पी नवरात्र", "हॅप्पी रामनवमी" या "हॅप्पी शिवरात्री" से क्या मतलब.... उन पर्वों पर तो उन देवताओं का पूजन, जप, उपासना करना ही उचित और अपेक्षित है..! वर्षारम्भ/वर्षप्रतिपदा, दशहरा, दिवाली जैसे उत्सवों के अवसर पर अपने से बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेने की परम्परा है। ऐसे उत्सवों के दिन अपनी बराबरी के छोटे परिचितों को "यह उत्सव आपके लिये शुभ हो या लाभप्रद हो" इस प्रकार या थोड़े में "शुभ दशहरा", "शुभ दीपावली" ऐसे शब्दों में अपनी शुभेच्छा व्यक्त की जाती रही है... परन्तु अब यहाँ नासमझ "पढ़ेलिखे" लोग "शुभ दशहरा" शुभ दीपावली" या "मंगलमय होली" जैसे शब्द भूल कर वही पाश्चात्यों की जूठनभरी "हॅप्पी दिवाली" "हॅप्पी होली" की पत्तल परोसने लगे हैं..!

अरे, कभी तो सुधर जाइये और अपने पर्व-त्यौहार अपनी परम्परा के अनुसार ही मना कर एक दूसरे के साथ बर्ताव कीजिये..! परन्तु यह "हॅप्पी हॅप्पी" का बुखार इतना सिर चढ़ कर बोलता है कि "गुरुपूर्णिमा" जैसे पावन पर्व पर लोग अपने गुरुजनों और गुरुतुल्य व्यक्तियों को प्रमाण करने की जगह उनके मुँह पर भी "हॅप्पी गुरुपूर्णिमा" का खोटा सिक्का फेंक कर मारते दिखायी देते हैं कि इन पर केवल तरस आता है..!

आशा है कि तथाकथित पढ़ेलिखे लोग समाजमाध्यमों में एक-दूसरों के लिये किसी भी भारतीय पर्व-त्यौहार पर शुभकामनाएँ व्यक्त करते समय इस "हॅप्पी हॅप्पी" की नासमझी को त्याग कर अपनी परंपरा के अनुसार कम से कम "शुभ दशहरा" "शुभ दीपावली" या "मंगलमय होली" ऐसे सन्देश भेज कर अपनी परम्परा का भान रखेंगे...!


22 May 2020

वास्तविक भारतीय इतिहास : नये प्रमाण

भारत के स्वतन्त्र होते ही नेहरू जी ने तथाकथित "वैज्ञानिक विचार" पर बल दिया और एक भारतीय परम्परा, इतिहास तथा हिन्दु आस्थाओं के विरुद्ध एक अभियान छेड़ा। परिणामत: नुरूल हसन, इरफ़ान हबीब, रोमिल्ला थापर जैसे निपट साम्यवादियों को विद्वान्‌ तथा इतिहास के विशेषज्ञ घोषित कर नेहरू-गांधी परिवार के काँग्रेसी शासन ने दशकों तक उनकी लिखी सभी पुस्तकों को सन्दर्भग्रन्थों की मान्यता दी तथा इसी परम्परा के लोगों के द्वारा यहाँ के विद्यालयों/महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम के लिये इतिहास की पाठ्यपुस्तकें लिखवा लीं। परिणामत: आनेवाली पीढियों को शालेय अध्ययन के अन्तर्गत ही भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में अनास्था, सम्भवत: तिरस्कार, के संस्कार दिये गये। मगध के राजा अशोक के पूर्व का लगभग सारा इतिहास तो पुस्तकों से हटाया गया तथा अशोक के मन में कलिंग युद्ध में की अमानवीय हिंसा के पश्चात्‌ उपजी तथाकथित अहिंसा को ही भारतीय संस्कृति का मानदण्ड बता कर पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से अहिंसा के नाम पर पौरुषहीन तथा पुरुषार्थहीन प्रतिक्रियाशून्यता का ही संस्कार विद्यार्थियों को दिया गया।
तत्पश्चात्‌ का भारत का पूरा इतिहास कूड़ेदान में डाल कर बाबर से बहादुरशाह तक का लगभग ३५० वर्षों का कालखण्ड ही पाठ्यपुस्तकों में भारत का इतिहास बताया गया। उसमें भी सभी मुग़ल तथा तुर्की आक्रमणकारी आक्रान्ताओं के द्वारा यहाँ के समाज तथा संस्कृति पर किये गये सभी बर्बर अत्याचारों एवं अनन्वित दुराचारों को छिपा कर उन सभी को अपनी प्रजा के हितैषी, दयालु तथा उदारमना बता कर उनके कार्यकाल को ही भारत के स्वर्णिम युग के रूप में प्रस्तुत किया गया। ऐसा करते समय बादामी, वेंगी तथा कल्याणी के चालुक्य (लगभग ७०० वर्ष), पाण्ड्य (लगभग ७५० वर्ष), कलिंग, उड़ीसा से मलाया तथा जावा-सुमात्रा तक शासन करनेवाला चोल वंश (लगभग ५०० वर्ष), पल्लव (लगभग ६०० वर्ष), गुर्जर (लगभग ५०० वर्ष) तथा मुग़लों को असम आदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में घुसने न देने वाले अहोम (लगभग ६००  वर्ष) आदि राजवंशों का इतिहास तो पाठ्यपुस्तकों से सर्वथा हटा दिया गया। पल्लव, चोल, पाण्ड्य, होयसल, गुर्जर आदि राजवंशों के काल में पोषित तथा विकसित भारतीय नृत्य, नाट्य, संगीत, गायन, शिल्प आदि कलाओं को पाठ्यपुस्तकों में स्थान ही दिया जाने के कारण घृष्णेश्वर का कैलास मन्दिर, बृहदीश्वर मन्दिर, रामेश्वरम्‌, हलेबिडु आदि स्थानों के विशाल स्थापत्य तथा अद्भुत शिल्पकला के स्थान पर केवल मुग़लकाल में बने कब्रों को ही भारतीय संस्कृति तथा हिन्दु परम्पराओं के विरोधी इन साम्यवादी छद्म इतिहासकारों के द्वारा भारतीय स्थापत्य एवं शिल्प के रूप में अपनी पुस्तकों तथा शालेय पाठ्यपुस्तकों में प्रस्तुत किया गया। कत्थक, भरतनाट्यम्‌, कुचिपुडी आदि भारतीय नृत्यों तथा प्राचीनतम काल से चली आ रही स्वर-ताल पर आधारित गायनशैलियों के स्थान पर मुग़ल दरबारों तथा कोठों पर होनेवाला शृंगारिक नृत्य तथा गायन ही मानो इन छद्म इतिहासकारों की दृष्टि में भारतीय संगीत था।
यही स्थिति रामजन्मभूमि सम्बन्धित विवाद को लेकर रही। अंग्रेजों के काल के रेविन्यू रिकार्ड में "मस्ज़िद जन्मस्थान" ऐसा ही उल्लेख है, उसे इन छद्म इतिहासविज्ञों ने केवल "बाबरी मस्ज़िद" ही कहा तथा छ: दशकों तक भारत पर शासन करनेवाली काँग्रेस ने उस स्थान पर इतिहास में कभी किसी मन्दिर के होने की तथा उस मन्दिर को तोड़ कर ही बाबर के सरदार मीर बाकी के द्वारा मस्ज़िदनुमा भवन खड़ा किये जाने की बात को हमेशा नकारा। खैर, इस वर्ष देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस वाद का स्थायी निर्णय करने की ठान ली तथा लम्बे युक्तिवाद सुनने के बाद विवादित पूरी भूमि को "रामजन्मभूमि" स्वीकार कर उस स्थान पर केवल भव्य श्रीराममन्दिर बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनौ खण्डपीठ के तथा अन्तत: सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इतिहास के जानकारों के रूप में साक्ष्य प्रस्तुत करने समय इरफ़ान हबीब तथा रोमिल्ला थापर ने उस स्थान पर किसी भी प्राचीन मन्दिर के होने की सम्भावना को सिरे से नकार दिया था। यह बात भिन्न है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इन छद्म इतिहासकारों के मत को तथ्यों से विपरीत तथा काल्पनिक मान कर अस्वीकार कर दिया।
और अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार उस स्थान पर भव्य मन्दिर बनाने के कार्य के प्रथम चरण में वहाँ का मलबा हटा कर नींव की खुदाई प्रारम्भ हुई तब पहले ही दो दिनों में वहाँ लगभग ८०० वर्ष पुराने प्राचीन मन्दिर के अवशेष हाथ लगे हैं... खुदाई का कार्य पूरा होते होते वहाँ भूगर्भ में दबे पड़े न जाने ऐसे कितने और अवशेष निकल कर सामने आयेंगे..!परन्तु यह सबसे विश्वसनीय प्रमाण ही है कि नेहरू-गांधी परिवार की परम्परा के द्वारा पालित-पोषित ये सभी वामपंथी छद्म इतिहासकार सदा ही असत्य बताते रहे हैं।
आशा है कि कभी कोई शासन इस विषय में ठोस कदम उठा कर देश के विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में पढ़ाये जानेवाले पाठ्यपुस्तकों, विशेषत: इतिहास की पुस्तकों, में समूल परिवर्तन लाकर देश के वास्तविक इतिहास को अगली पीढ़ियों के हाथों में पाठ्यक्रम के रूप में सौंपेगा।













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चलते चलते..
प्राचीन भारतीय सभ्यता की गणित तथा विज्ञान के क्षेत्रों की अपार क्षमता को नकार कर उन परम्पराओं की खिल्ली उड़ानेवाले समस्त आधुनिक विज्ञाननिष्ठों को अभी जन्मभूमि के स्थान पर भूगर्भ में मिला एक शिल्पखण्ड सहज रूप से चुनौती दे गया... 
संलग्न चित्रों में शिला पर उत्कीर्ण कमल की आकृति को बारीकी से देखें... भीतरी गोल में बने कमलपुष्प की एक जैसी १३ पंखुड़ियाँ हैं तो बाहरी वृत्त में कमल की समान आकार की २९ पंखुड़ियाँ हैं। वैसे १३ तथा २९ दोनों "मूल संख्याएँ" हैं (उन्हें अन्य किसी भी संख्यासे पूरा भाग नहीं दिया जा सकता।) और वृत्त के ३६०° अंश भी १३ तथा २९ इन संख्याओं के द्वारा समान रूप से विभाजित नहीं हो सकते... ऐसे में कोई यह बतायें कि लगभग ८०० वर्ष पूर्व उस काल में ३६० अंशों के समान १३ तथा २९ भाग गणित की किस युक्ति के आधार पर किये गये होंगे, बगल-बगल की दो समान आकार की पंखुड़ियों में कितने अंशों का कोण है तथा वृत्ताकार कमल की १३ तथा २९ पंखुड़ियों को उस शिला पर इतने अचूक रूप में कैसे चित्रित किया गया होगा..? और हाँ, आजके विज्ञाननिष्ठ इन प्रश्नों का उत्तर निकालने के लिये कैलकुलेटर/कम्प्यूटर का प्रयोग न करें... इस शिल्प की निर्मिति के काल में यहाँ ऐसे उपकरण उपलब्ध नहीं थे...!
और यह तो उस काल के स्थापत्य में प्रयुक्त गणित की एक झलक मात्र है... पूरे मन्दिर या भवन के निर्माण में प्रयुक्त वास्तुशास्त्र गणित की कैसी कैसी अद्भुत विशेषताओं से भरा होगा, यह तो केवल अनुमान का विषय है..!

15 July 2019

गुरुपूर्णिमा

आज गुरुपूर्णिमा... महर्षि वेदव्यास की जयन्ती के निमित्त प्राचीन आर्ष परम्परा से चली आ रही ज्ञानपरम्परा के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व..!
स्मरण रहे कि आज ’शिक्षक दिवस’ या ’अध्यापक दिन’ नहीं है, विद्यालयों के पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ानेवालों को हमारी परम्परा ने ’गुरु’ नहीं कहा है। वस्तुत: गुरु हमारी वेद-उपनिषदों के चली आ रही अध्यात्मविद्या के संवाहक होते हैं। ’विद्या’ वही जो आत्मबोध के द्वारा जीव को मुक्त करा दे.. "सा विद्या या विमुक्तये"..!
सामान्यत: प्रत्येक व्यक्ति को ’यह’ कह कर अपने से अतिरिक्त जगत्‌ का भान होता है, परन्तु स्वयं अपने अस्तित्व को भी ’मेरी/मेरी’ कहे जानेवाले अपने से अन्य पदार्थों के अस्तित्व का आश्रित मान लेता है... इसलिये अस्थिमांसचर्म के बने शरीर की आयु, लम्बाई, रंग तथा रोगी/निरोगी होने को अपने ही लक्षण मानता है, मन की एकाग्रता या विक्षेप को अपना स्वयं का ही गुणधर्म मान लेता है... और ऐसी स्थिति में अपने वास्तविक स्वरूप के भान तथा परिचय को ही खो देता है..! वस्तुत: जाग्रत-स्वप्न-सषुप्ति हो या बाल्य-तारुण्य-वृद्धत्व हो, शरीर की इन सभी परिवर्तनों में भी इन सब को जाननेवाला ’मैं’ यही अपना स्वयं का अस्तित्व है, वही उसका परिचय है..! मन की कोई भी वृत्ति या बुद्धि का कोई भी विचार कितना भी बदलता है, तो भी उन सभी परिवर्तनों का तथा उनके साथ मन-बुद्धि का भी ’भान’ रखनेवाला ’मैं’ यही तो अपना आपा है, अपना स्वरूप है..! ’मेरा’ कह कर पहचाने गये इंद्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के साथ अपने जानने-समझने वाले ’स्व’ का तादात्म्य ही बन्धन है तथा इनसे रहित शुद्ध आत्मभान को, आत्मपरिचय को नित्य आत्मबोध के रूप में स्थिर करानेवाली विद्या ही आत्मविद्या है और उसे प्रदान करनेवाला ही हमारी परम्परा में ’गुरु’रूप में पूजनीय है।
हमारी गुरुपरम्परा के द्वारा प्रदत्त इस आत्मबोध में ’मानी हुई’ कोई बात नहीं है; किसीने कहा या किसी ग्रन्थ में लिखा है, इस आधार पर न तो अपने अस्तित्व को मानना पड़ता है और न ही सिद्ध करना होता है। शरीर-मन-बुद्धि के संघात को जाननेवाला, उनका संचालन करनेवाला तथा उनमें होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी रूप से भान होनेवाला ’मैं’ यह तो प्रत्येक का अपना अकाट्य अनुभव है तथा इस आत्मबोध में अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है... बस, "मैं हूँ" यह प्रत्येक का अनुभव ही स्वप्रमाण है।
भगवान्‌ शंकराचार्य जी ने इसी आत्मभान  तथा आत्मबोध के परिचायक के रूप में भगवान्‌ सदाशिव के गुरुरूप श्री दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करते हुए इस आत्मभाव तथा आत्मबोध को ही परिलक्षित किया है...
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया 
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥
(बचपन आदि शारीरिक अवस्थाओं, जा्ग्रत आदि मानसिक अवस्थाओं और अन्य सभी अवस्थाओं में विद्यमान और उनसे वियुक्त (अलग), सदा ’मैं हूँ’ की स्फुरणा करने वाले अपने आत्मा को स्मरण करने पर जो भद्र मुद्रा के द्वारा प्रकट कर देते हैं, उन श्रीगुरुरूपी श्री दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है ॥
"मेरे शरीर के लम्बे/नाटेपने, गोरे/कालेपने या मोटे/पतलेपने को जाननेवाला मैं हूँ" तथा "मुझे अपने मन के सुखी/दु:खीपने का भान होता है" के स्थान पर शरीर-मन के गुणधर्मों को अपने स्वयं पर लाद कर "मैं लम्बा/नाटा, गोरा/काला, मोटा/पतला तथा सुखी/दु:खी हूँ" मानना केवल भ्रम है और इस भ्रम का निराकरण करते हुए शरीर तथा मन की प्रत्येक अवस्था का भान मुझे है एवं उनमें होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन में भी मेरा स्वरूप अपरिवर्तनीय रूप से विद्यमान है" यह ठीक-ठीक समझ लेना तथा इस आत्मभान का ही अनुसंधान करना यही आत्मविद्या है, भारतीय अध्यात्मविद्या है..! प्रत्येक के इस स्वत:सिद्ध अनुभव को समझाने के लिये न किसी ग्रन्थ या पाठ्यक्रम की आवश्यकता है, न ही इसे सिद्ध करने के लिये किसी प्रयोगशाला की आवश्यकता है। "मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ" कहनेवाले सन्त कबीरदास जी भी इस अनुभव का बखान करते पाये जाते हैं। और इस आत्मभान में अनुभवविरुद्ध या तर्कविसंगत कुछ भी न होने से व्यवहार में बुद्धिवादी तथा विज्ञाननिष्ठ होने की डींग हाँकनेवाले भी अपने स्वयं के इस अनुभव को नकार नहीं सकते.. आस्तिक कसे जाने के भय से खुले मन से स्वीकार न पाये तो मौन हो जायेंगे, परन्तु शरीर से भिन्न अपने स्वयं के आत्मस्वरूप को नकार तो सकते नहीं..!!
 ग्रन्थ, पाठ्यक्रम तथा प्रयोगों के आधार पर मिलनेवाली सभी जानकारी अपने ’स्व’ के अतिरिक्त अन्य किसी की होती है। सामान्य विद्यालयों में अध्यापकों के द्वारा ऐसी जानकारी ही दी जाती है, परन्तु इस प्रकार से प्राप्त जानकारी को भी समझने वाले मुझ ’स्वयं’ का अनुभव तो प्रत्येक को बिना किसी बाह्य जानकारी के ही होता है.... केवल उस शुद्ध आत्मस्वरूप का स्मरण भर कराना होता है। उपनिषद्‌ तथा भगवद्गीता के "श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌" तथा "ज्ञनिन: तत्त्वदर्शिन:" इन संकेतों के अनुसार गुरु का स्वयं शास्त्रनिष्ठ तथा आत्मानुभवसम्पन्न होना आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा विचार करते ही समझ में आनेवाले आत्मस्वरूप का भान देशकालादि के परे का स्थिर आत्मानुभव हो, इसलिये गुरु के द्वारा उपदिष्ट साधनापद्धति का सम्पादन भी इस क्रम में आवश्यक हो जाता है। स्वयं आत्मनिष्ठ होने से गुरु के पास वैसे साधनाक्रम के अनुसरण का भी अनुभव होता है... अत: वह इस अध्यात्मविद्या तथा साधनामार्ग के विषय में स्वानुभवसिद्ध मार्गदर्शन कर सकता है। साधक की मानसिक तथा बौद्धिक स्थिति तथा क्षमता के आधार पर गुरु उसे साधना के रूप में उपासना, ध्यान, कर्म आदि विभिन्न मार्गों में से किसी उचित मार्ग का उपदेश कर सकते हैं। विशिष्ट साधनामार्ग का क्रमबद्ध अनुसरण करने से अपने ’स्व’ के अनुभव की परिणति देशकालादि सीमाओं के पार असीम अखण्ड परमात्मसाक्षात्कार में होना ही आत्मविद्या का चरम लक्ष्य है।
आत्मस्वरूप का बोध तथा साधनापथ में मार्गदर्शन करानेवाला ही हमारी आर्ष आत्मविद्या का संवाहक ’गुरु’ है, उसके तथा अनादि काल से चली आ रही गुरुपरम्परा के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता की अभिव्यक्ति ही ’गुरुपूर्णिमा’ है...!
- स्वामीजी, गुरुपूर्णिमा २०१९

14 May 2017

बस, यूँही...!

स्वभावत: मनुष्य अभिव्यक्त हुए बिना रहता नहीं और आजकल सोशल मीडिया के प्रसार के बाद तो प्रत्येक व्यक्ति सहजता से लोगों के सामने अपने विचार और भावनाएँ रखने लगा है।
एक देखा कि फेसबुक जैसे माध्यम का उपयोग १०-५ पंक्तियों में अपनी बात रखने तक सीमित रह जाता है। सामान्यत: सामने उपलब्ध सामाजिक, राजकीय परिवेश में कभी किसी मुद्दे पर कुछ विस्तार से लिखने का मन करता है... ऐसे में अपने ब्लॉग के माध्यम से अभिव्यक्त होना सुविधाजनक लगता है। फिर एक बात और... एक संन्यासी के तटस्थ तथा लगावरहित दृष्टिकोण से अनेक मामलों में हमारी बात अन्य बहुतसे लोगों से भिन्न होती है.... तब तो विस्तार से व्यक्त होना आवश्यक हो जाता है।
इतना तो निश्चित है कि चर्चा के किसी भी विषय में हम व्यक्तिगत रूप से पक्षधर नहीं हैं... जो भी सामने आया, उसके बारे में एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से अपना मत व्यक्त करने का भाव रहेगा । इस लेखन में न तो किसी प्रकार के बोझिल ’वैचारिक’ सिद्धान्त प्रस्तुत करने का हमारा मन्तव्य है, न ही नीतिशास्त्र या अध्यात्म की खुराक देने का कोई इरादा है.... बस, किसी विषय के बारे में मन ने कुछ निष्कर्ष निकाले तो लिख देंगे..... "बस, यूँही...!"
यह निश्चित है कि इस ब्लॉगलेखन को हम प्रतिदिन नियमित रूप से नहीं कर पायेंगे.... पर इतना अवश्य है कि समय-समय पर कुछ न कुछ अवश्य लिखते रहेंगे।
- स्वामीजी १४मई२०१७