16 September 2021

तालिबान और भारतीय लिबरल

 आतंकवादी तालिबान का अफ़गानिस्तान पर वर्चस्व पूरे विश्व के लिये चिन्ता का विषय बना है... परन्तु उससे भी अधिक चिन्ताजनक बात यह है कि भारत के तथाकथित लिबरल, साम्यवादी तथा सेक्कुलर लोग तालिबान का भूल कर भी विरोध नहीं कर रहे हैं....! यहाँ के तथाकथित "शान्तिप्रिय" समुदाय के लोग अपने साम्प्रदायिक भाईचारे (उम्मा, Muslim Brotherhood) के कारण तालिबानियों के आतंकवादी हिंसाचार तथा अलोकतान्त्रिक व्यवहार का भी समर्थन कर सकते हैं, परन्तु ऐसी क्या बात है कि यहाँ के तथाकथित लिबरल, साम्यवादी तथा सेक्कुलर लोग तालिबान के विरोध में एक अक्षर भी नहीं बोलते..?

इसकी पार्श्वभूमि समझने के लिये तालिबानी विचारधारा तथा संगठन के भारतीय मूल पर दृष्टिपात करना समयोचित होगा...! कोई कोई विदेशी आतंकवादी विचारधारा है, इस भ्रम में कोई न रहे तो ही अच्छा है... इस पूरी विचारधारा का मूल भारत में ही है... यहाँ की "जमात उलेमा-इ-इस्लाम" एवं देवबन्द की कट्टरता में ही तालिबान का स्रोत छिपा है..!

"तालिब" का अर्थ है "विद्यार्थी"... परन्तु ये किसी आधुनिक विश्वविद्यालय या अभियांत्रिकी/आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के विद्यार्थी नहीं होते हैं, अपितु इस्लामी मदरसों में साम्प्रदायिक शिक्षा प्राप्त करनेवाले ही होते हैं...! जिस प्रकार सनातन भारतीय विचार-परम्परा में एवं उपासना में शैव, वैष्णव, शाक्त, सांख्य, अद्वैती आदि दर्शनों की परम्पराएँ हैं, उसी प्रकार इस्लाम में प्रमुख रूप से शिया, सुन्नी, इबादी, अहमदिया एवं सूफ़ी विचारधाराएँ प्रधान हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के सुन्नी मुसलमानों में मुख्य रूप से परम्परावादी "बरेलवी" तथा पुनरुत्थानवादी "देवबन्दी" विचारधाराओं के उगम का सम्बन्ध तो मुग़ल शासनकाल से मिलता है । एक का मुख्यालय बरेली में तो दूसरे का देवबन्द में होना उनके नामों से ही स्पष्ट है । देवबन्दी परम्परा सुन्नी हनाफ़ी मत की है और सन १८६६ में मुहम्मद कासीम तथा रशीद अहमद द्वारा देवबन्द में स्थापित इस विचारधारा का प्रभाव "जमाते उलेमा-ए-हिन्द" एवं "जमाते उलेमा इस्लाम-ए-पाकिस्तानी" पर समान रूप से है । इस्लामी पुनरुज्जीवन का एवं गज़वा-ए-हिन्द का मुख्य विचार १७६२ में निधन हुए शाह वलीउल्लाह इस इस्लामी आलिम का था । इसी शाह वलीउल्लाह ने काफ़िर मराठाओं के विरोध में इस्लामी ताकत को बढ़ाने के लिये अफ़गानी  सुलतान अहमदशहा अब्दाली को भारत में आमन्त्रित कर पानिपत के तीसरे युद्ध का सूत्रपात किया था, इसे भारत पर इस्लामी शासन के सन्दर्भ में भूला नहीं जा सकता । 

भारत पर इस्लाम का पूर्ण वर्चस्व (गज़वा-ए-हिन्द), शरीया के अनुसार कट्टर कानून, स्त्रियों का बुरक़ा, काफ़िरों (हिन्दू-सिख) की सम्पत्ति तथा स्त्रियों के अपने अधीन करना, मूर्तिपूजा का विरोध करने के लिये मन्दिरों तथा मूर्तियों को ध्वस्त करना ये इस देवबन्दी विचारधारा के मुख्य लक्ष्य हैं.... स्वाभाविक था कि इन्हीं की अफ़गानी शाखा ने बायिमान की विशाल बुद्धमूर्ति को भी तोड़ा था...! सभी तालिबानी नेता पाकिस्तान के देवबन्दी मदरसों के ही "तालिब" हैं । भारत में देवबन्द के अलावा औरंगज़ेब के समय से चले आ रहे हनाफ़ी गुट का "फ़िरंगी महल" यह भी एक धर्मपीठ है... अलीगढ़ से अलग हुए मौलाना शिबली, मौलाना नुमानी, मौलाना नदवी आदि द्वारा लखनौ में बनाया गया नवदत्-उल्-उलेमा भी एक इस्लामी धर्मपीठ है, परन्तु सर्वाधिक महत्त्व तथा सम्मान तो देवबन्द को ही मिलता है...!

वर्तमान में भारत के लगभग १५% मुसलमान इसी देवबन्दी विचार के अनुयायी हैं । स्वतन्त्रता संग्राम के काल में अपनी कुछ माँगे मनवाने के लिये देवबन्दियों ने काँग्रेस को सहयोग दिया था, इतने भर के लिये उन्हें "राष्ट्रीय मुसलमान" मानने की भूल की जाती है...! केरल में मोपलाओं ने दंगा भड़का कर हज़ारो हिन्दुओं की हत्या की, तब यही देवबन्दी उलेमाओं ने उनका समर्थन किया.... स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा अब्दुल रशीद इनके लिये "जिहादी" था...! कभी "राष्ट्रवादी" काँग्रेसी कहे जानेवाले मौलाना मुहम्मद अली बाद में मुस्लिम लीग में जा कर कहते हैं "एक फटेहाल चारित्र्यहीन मुसलमान भी मेरी दृष्टि में केवल मुसलमान होने के कारण गांधीजी से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि गांधी मुसलमान तो हैं नहीं..!" 

सन १९२३ के काकीनाडा काँग्रेस अधिवेशन में मौलाना मुहम्मद अली ने कहा कि हिन्दुस्तान में हिन्दुओं और मुस्लिमों के वर्चस्वक्षेत्रों को पहचान कर उन्हें उस धर्म के वर्चस्व के आधार पर स्वतन्त्र किया जाय और ऐसे अनेक राज्य इकट्ठा हो कर भारत का संघराज्य बनायें, लेकिन वह United States न हो कर United Faiths होना चाहिये...! अहरार नेता ताजुद्दिन अन्सारी, अताउल्ला शहा बुखारी, जमियत-उल्-उलेमा के नेता मौ. अबुल हसनात्, मो. अहमद अली, मौ. अब्दुल हमीद बदायुनी ये सभी एक बात पर सहमत थे कि भारतीय मुसलमानों का  भारत के साथ एकनिष्ठ रहना सम्भव नहीं है..!

स्वतन्त्रता संग्राम में दिखावे के लिये "राष्ट्रवादी" बने सभी देवबन्दी उलेमाओं एवं नेताओं को भारत केवल मुसलमानों का देश बनाना था...! आज अफ़गानिस्तान पर वर्चस्व स्थापित करनेवाले सभी तालिबानी इसी हनाफ़ी देवबन्दी गुट के मदरसों के "तालिब" हैं, अत: उनके मन में भारत पर इस्लाम का पूर्ण वर्चस्व (गज़वा-ए-हिन्द) यह लक्ष्य के रूप में हमेशा बना रहेगा...!

आजकल के साम्यवादी, तथाकथित उदारतावादी लिबरल तथा सेक्कुलर लोगों को भारत का एक संगठित, सशक्त एवं सार्वभौम राष्ट्र बन कर उभरना सहन नहीं होता है... और पिछले सात वर्षों में नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में हो रहा हिन्दुओं का धार्मिक तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान तो इन लिबरलों तथा सेक्कुलरों के पेटदर्द का सबसे बड़ा कारण बना है । पिछले सत्तर वर्षों में तो इन्हीं लोगों ने पाठ्यक्रम की पुस्तकों तक से भारत में हिन्दु वर्चस्व का कालखण्ड ऐसे गायब कर दिया कि मौर्यकाल के बाद भारत के इतिहास में एकदम बारहसौ वर्ष बाद का मुगल काल पढ़ाया जाता है... बीच का कर्कोट, चोल, पाण्ड्य, वाकाटक, गुर्जर, प्रतिहार, अहोम, मराठा आदि साम्राज्यों का इतिहास तो २-४ पन्नों में ही सिमट कर रह गया है...! परन्तु आज पुन: भारत में हिन्दुओं को सांस्कृतिक तथा धार्मिक रूप से सजग तथा जागृत होता देख कर सभी लिबरलों तथा सेक्कुलरों की नींद उड़ गयी है....! 

स्वाभाविक है कि तालिबानियों को भले ही सारी दुनिया आतंकवादी, अत्याचारी तथा लोकतन्त्रविरोधी कहती हो, तो भी भारत के सभी लिबरल तथा सेक्कुलर लोग तालिबान के समर्थन में जुटे दिखायी देते हैं.... केवल इसलिये कि देवबन्दी मदरसों के विद्यार्थी रहे तालिबानियों के लिये "गज़वा-ए-हिन्द" यह एक महत्त्वपूर्व लक्ष्य है...!

- स्वामीजी १६ सितम्बर २०२१

27 August 2021

सम्पत्ति का मुद्रीकरण Asset Monetisation

 आजकल अपनी बुद्धि गिरवी रखे हुए कई लोग बिना सोचे-समझे और बिना कुछ जाने एक ही हल्ला मचा रहे हैं कि प्रधानमन्त्री मोदी देश के रेल्वे स्टेशन, सड़के, हवाईअड्डे, बन्दरगाह, सरकारी गोदाम, स्टेडियम सब कुछ "बेच रहे हैं"...! खैर, जब इन लोगों की बुद्धि गिरवी पड़ी है, तब वे समझेंगे कैसे और जानेंगे भी क्या..?

परन्तु सामान्य व्यक्ति के लिये यह समझना आवश्यक है कि मोदी सरकार की National Monetization Pipeline (एनएमपी) योजना वास्तविक रूप से क्या है..?

★ अगले चार वर्षों में कम से कम ₹ ६ लाख करोड़ प्राप्त करानेवाली इस महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP) की घोषणा वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण ने की है।

★ निजी क्षेत्र की कम्पनियों से अग्रिम धनराशि लेकर उन प्रकल्पों का स्वामित्व सरकार के ही पास रख कर (पुन: बताऊँ कि उन प्रकल्पों का स्वामित्व सरकार के ही पास रख कर) उनसे जनसामान्य से पाने योग्य सेवाशुल्क, कर और लागत का अंश वसूल करने के अधिकार इन निजी कम्पनियों को हस्तान्तरित करने की यह एक आसान व्यवस्था है।

★ ऐसी व्यवस्था भारत में आज पहली बार नहीं लायी जा रही है... Operate Maintain Transfer (OMT), Toll Operate Transfer (TOT), Operations, Maintenance & Development (OMD) ऐसी तीन पद्धतियों से भारत सरकार के सैंकड़ों प्रकल्पों का Monetization अटलबिहारी बाजपेयी एवं मनमोहन सिंग के कार्यकाल में हुआ है...!

★ पूरे देश में विशेषत: राष्ट्रीय महामार्गों पर बने टोल नाकों पर OMD और TOT पद्धति से टोल वसूली के ठेके पिछले दो दशकों से दिये जा रहे हैं.... देश के बहुत से बड़े हवाईअड्डों के रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन का दायित्व OMD पद्धति से कई कम्पनियों को दिया जाता रहा है..!

★ संक्षेप में कहें तो उन प्रकल्पों से सरकार को अगले २०-२५ वर्षों तक हो सकनेवाली आमदनी को इन कम्पनियों से अग्रिम ले कर उन्हें वे प्रकल्प व्यावसायिक ढंग से चलाने के लिये जाते हैं... कंपनी ने सरकार को अग्रिम दी धनराशि से अधिक कमाई वह कम्पनी कर ले तो वह उसका लाभ होगा, लेकिन नियमित रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन तथा सेवारत कर्मचा्रियों का वेतन आदि व्यय करने के उपरान्त पैसा न बचे तो कम्पनी को वह घाटा भी सहना पड़ेगा...!

★ तय की गयी कालावधि के पश्चात्‌ चाहे तो सरकार स्वयं उस प्रकल्प के नियमित रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन का जिम्मा उठाये या फिर किसी कम्पनी को आगे की अवधि के लिये अग्रिम धनराशि ले कर अगला ठेका दे दे । 

★ इतना सब होने पर भी उन प्रकल्पों के स्वामित्व का पूरा अधिकार भारत सरकार के पास ही रहता है, शुल्क की वसूली का अधिकार किसी कम्पनी को हस्तान्तरित करने पर भी स्वामित्व सरकार के पास रहता है...!

★ सब कुछ इतना सुस्पष्ट, पारदर्शी तथा आसानी से समझने योग्य होने पर भी व्यर्थ में "बेच दिया" का हल्ला मचा कर अपने मुँह के बल गिरने का ही शौक विरोधियों ने पाल रखा हो तो कोई क्या कर सकता है..? 

★ वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने दि.२३ ऑगस्ट को नया "राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाईपलाईन प्रोजेक्ट" प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार केन्द्र सरकार के स्वामित्व की और स्थापित क्षमता से कम मात्रा में उपयोग की जानेवाली भूमि-भवनादि स्थिर सम्पत्ति एवं संसाधन निजी उद्योजकों तथा उद्योग कम्पनियों को नीलामी की उचुत प्रक्रिया के उपरान्त दीर्घ अवधि के लिये किराये पर या लीज़ पर दिये जायेंगे,,, और हाँ, नीलामी केवल सरकार को दी जानेवाली अग्रिम धनराशि को निश्चित करने के लिये होगी, सरकारी सम्पत्ति/संसाधन के स्वामित्व की नहीं...! किराये/लीज़ की अवधि में वे निजी उद्योजक तथा कम्पनियाँ उस सम्पत्ति/संसाधन का उपयोग कर सकेंगे... उस अवधि में उस भूमि पर लगाये जानेवाले प्रकल्पों का निर्माण, नियमित रखरखाव, मरम्मत तथा व्यवस्थापन वही निजी उद्योजक करेंगे, उन प्रकल्पों को चलाने के लिये नियुक्त कर्मचारियों का वेतन, भत्ते आदि का दायित्व भी उसीउ द्योजक के कन्धों पर होगा.... ऐर उस अवधि में भी उस सम्पत्ति/संसाधन पर स्वामित्व का अधिकार सरकार का यानी देश का ही होगा... किसी को कुछ भी "बेचा" जानेवाले  नहीं है...! 

★ इस प्रकार किये जानेवाले सरकारी सम्पत्ति के मुद्रीकरण (Asset Monetisation) के कुछ लाभ तो स्पष्ट हैं....

१) सरकार को कम से कम ₹ ६ लाख करोड़ की धनराशि अग्रिम मिल जायेगी।

२) इन प्रकल्पों को चलाते समय होता रहा वित्तीय घाटा अब देश को उठाना नहीं पड़ेगा।

३) नेहरू-इन्दिरा पितापुत्री के द्वारा देश पर थोपे हुए समाजवाद एवं राष्ट्रीयकरण के चलते सरकारी नौकरियों के सुरक्षित पदों पर बैठ कर बिना कुछ काम किये मोटा वेतन लेनेवाले मुफ़्तखोर सरकारी कर्मचारियों की फ़ौज़ को आगे से पालना नहीं पड़ेगा...!

- स्वामी निश्चलानन्द

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(इस विषय को अधिक विस्तार से समझने के लिये आगे की लिंक पर उपलब्ध लेख सहाय्यकारी हो सकता है।

https://indianexpress.com/article/explained/explained-what-is-the-governments-plan-with-the-national-monetisation-pipleline-7468258/)