आज गुरुपूर्णिमा... महर्षि वेदव्यास की जयन्ती के निमित्त प्राचीन आर्ष परम्परा से चली आ रही ज्ञानपरम्परा के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व..!
स्मरण रहे कि आज ’शिक्षक दिवस’ या ’अध्यापक दिन’ नहीं है, विद्यालयों के पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ानेवालों को हमारी परम्परा ने ’गुरु’ नहीं कहा है। वस्तुत: गुरु हमारी वेद-उपनिषदों के चली आ रही अध्यात्मविद्या के संवाहक होते हैं। ’विद्या’ वही जो आत्मबोध के द्वारा जीव को मुक्त करा दे.. "सा विद्या या विमुक्तये"..!
सामान्यत: प्रत्येक व्यक्ति को ’यह’ कह कर अपने से अतिरिक्त जगत् का भान होता है, परन्तु स्वयं अपने अस्तित्व को भी ’मेरी/मेरी’ कहे जानेवाले अपने से अन्य पदार्थों के अस्तित्व का आश्रित मान लेता है... इसलिये अस्थिमांसचर्म के बने शरीर की आयु, लम्बाई, रंग तथा रोगी/निरोगी होने को अपने ही लक्षण मानता है, मन की एकाग्रता या विक्षेप को अपना स्वयं का ही गुणधर्म मान लेता है... और ऐसी स्थिति में अपने वास्तविक स्वरूप के भान तथा परिचय को ही खो देता है..! वस्तुत: जाग्रत-स्वप्न-सषुप्ति हो या बाल्य-तारुण्य-वृद्धत्व हो, शरीर की इन सभी परिवर्तनों में भी इन सब को जाननेवाला ’मैं’ यही अपना स्वयं का अस्तित्व है, वही उसका परिचय है..! मन की कोई भी वृत्ति या बुद्धि का कोई भी विचार कितना भी बदलता है, तो भी उन सभी परिवर्तनों का तथा उनके साथ मन-बुद्धि का भी ’भान’ रखनेवाला ’मैं’ यही तो अपना आपा है, अपना स्वरूप है..! ’मेरा’ कह कर पहचाने गये इंद्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के साथ अपने जानने-समझने वाले ’स्व’ का तादात्म्य ही बन्धन है तथा इनसे रहित शुद्ध आत्मभान को, आत्मपरिचय को नित्य आत्मबोध के रूप में स्थिर करानेवाली विद्या ही आत्मविद्या है और उसे प्रदान करनेवाला ही हमारी परम्परा में ’गुरु’रूप में पूजनीय है।
हमारी गुरुपरम्परा के द्वारा प्रदत्त इस आत्मबोध में ’मानी हुई’ कोई बात नहीं है; किसीने कहा या किसी ग्रन्थ में लिखा है, इस आधार पर न तो अपने अस्तित्व को मानना पड़ता है और न ही सिद्ध करना होता है। शरीर-मन-बुद्धि के संघात को जाननेवाला, उनका संचालन करनेवाला तथा उनमें होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी रूप से भान होनेवाला ’मैं’ यह तो प्रत्येक का अपना अकाट्य अनुभव है तथा इस आत्मबोध में अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है... बस, "मैं हूँ" यह प्रत्येक का अनुभव ही स्वप्रमाण है।
भगवान् शंकराचार्य जी ने इसी आत्मभान तथा आत्मबोध के परिचायक के रूप में भगवान् सदाशिव के गुरुरूप श्री दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करते हुए इस आत्मभाव तथा आत्मबोध को ही परिलक्षित किया है...
"मेरे शरीर के लम्बे/नाटेपने, गोरे/कालेपने या मोटे/पतलेपने को जाननेवाला मैं हूँ" तथा "मुझे अपने मन के सुखी/दु:खीपने का भान होता है" के स्थान पर शरीर-मन के गुणधर्मों को अपने स्वयं पर लाद कर "मैं लम्बा/नाटा, गोरा/काला, मोटा/पतला तथा सुखी/दु:खी हूँ" मानना केवल भ्रम है और इस भ्रम का निराकरण करते हुए शरीर तथा मन की प्रत्येक अवस्था का भान मुझे है एवं उनमें होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन में भी मेरा स्वरूप अपरिवर्तनीय रूप से विद्यमान है" यह ठीक-ठीक समझ लेना तथा इस आत्मभान का ही अनुसंधान करना यही आत्मविद्या है, भारतीय अध्यात्मविद्या है..! प्रत्येक के इस स्वत:सिद्ध अनुभव को समझाने के लिये न किसी ग्रन्थ या पाठ्यक्रम की आवश्यकता है, न ही इसे सिद्ध करने के लिये किसी प्रयोगशाला की आवश्यकता है। "मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ" कहनेवाले सन्त कबीरदास जी भी इस अनुभव का बखान करते पाये जाते हैं। और इस आत्मभान में अनुभवविरुद्ध या तर्कविसंगत कुछ भी न होने से व्यवहार में बुद्धिवादी तथा विज्ञाननिष्ठ होने की डींग हाँकनेवाले भी अपने स्वयं के इस अनुभव को नकार नहीं सकते.. आस्तिक कसे जाने के भय से खुले मन से स्वीकार न पाये तो मौन हो जायेंगे, परन्तु शरीर से भिन्न अपने स्वयं के आत्मस्वरूप को नकार तो सकते नहीं..!!
ग्रन्थ, पाठ्यक्रम तथा प्रयोगों के आधार पर मिलनेवाली सभी जानकारी अपने ’स्व’ के अतिरिक्त अन्य किसी की होती है। सामान्य विद्यालयों में अध्यापकों के द्वारा ऐसी जानकारी ही दी जाती है, परन्तु इस प्रकार से प्राप्त जानकारी को भी समझने वाले मुझ ’स्वयं’ का अनुभव तो प्रत्येक को बिना किसी बाह्य जानकारी के ही होता है.... केवल उस शुद्ध आत्मस्वरूप का स्मरण भर कराना होता है। उपनिषद् तथा भगवद्गीता के "श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" तथा "ज्ञनिन: तत्त्वदर्शिन:" इन संकेतों के अनुसार गुरु का स्वयं शास्त्रनिष्ठ तथा आत्मानुभवसम्पन्न होना आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा विचार करते ही समझ में आनेवाले आत्मस्वरूप का भान देशकालादि के परे का स्थिर आत्मानुभव हो, इसलिये गुरु के द्वारा उपदिष्ट साधनापद्धति का सम्पादन भी इस क्रम में आवश्यक हो जाता है। स्वयं आत्मनिष्ठ होने से गुरु के पास वैसे साधनाक्रम के अनुसरण का भी अनुभव होता है... अत: वह इस अध्यात्मविद्या तथा साधनामार्ग के विषय में स्वानुभवसिद्ध मार्गदर्शन कर सकता है। साधक की मानसिक तथा बौद्धिक स्थिति तथा क्षमता के आधार पर गुरु उसे साधना के रूप में उपासना, ध्यान, कर्म आदि विभिन्न मार्गों में से किसी उचित मार्ग का उपदेश कर सकते हैं। विशिष्ट साधनामार्ग का क्रमबद्ध अनुसरण करने से अपने ’स्व’ के अनुभव की परिणति देशकालादि सीमाओं के पार असीम अखण्ड परमात्मसाक्षात्कार में होना ही आत्मविद्या का चरम लक्ष्य है।
आत्मस्वरूप का बोध तथा साधनापथ में मार्गदर्शन करानेवाला ही हमारी आर्ष आत्मविद्या का संवाहक ’गुरु’ है, उसके तथा अनादि काल से चली आ रही गुरुपरम्परा के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता की अभिव्यक्ति ही ’गुरुपूर्णिमा’ है...!
- स्वामीजी, गुरुपूर्णिमा २०१९
स्मरण रहे कि आज ’शिक्षक दिवस’ या ’अध्यापक दिन’ नहीं है, विद्यालयों के पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ानेवालों को हमारी परम्परा ने ’गुरु’ नहीं कहा है। वस्तुत: गुरु हमारी वेद-उपनिषदों के चली आ रही अध्यात्मविद्या के संवाहक होते हैं। ’विद्या’ वही जो आत्मबोध के द्वारा जीव को मुक्त करा दे.. "सा विद्या या विमुक्तये"..!
सामान्यत: प्रत्येक व्यक्ति को ’यह’ कह कर अपने से अतिरिक्त जगत् का भान होता है, परन्तु स्वयं अपने अस्तित्व को भी ’मेरी/मेरी’ कहे जानेवाले अपने से अन्य पदार्थों के अस्तित्व का आश्रित मान लेता है... इसलिये अस्थिमांसचर्म के बने शरीर की आयु, लम्बाई, रंग तथा रोगी/निरोगी होने को अपने ही लक्षण मानता है, मन की एकाग्रता या विक्षेप को अपना स्वयं का ही गुणधर्म मान लेता है... और ऐसी स्थिति में अपने वास्तविक स्वरूप के भान तथा परिचय को ही खो देता है..! वस्तुत: जाग्रत-स्वप्न-सषुप्ति हो या बाल्य-तारुण्य-वृद्धत्व हो, शरीर की इन सभी परिवर्तनों में भी इन सब को जाननेवाला ’मैं’ यही अपना स्वयं का अस्तित्व है, वही उसका परिचय है..! मन की कोई भी वृत्ति या बुद्धि का कोई भी विचार कितना भी बदलता है, तो भी उन सभी परिवर्तनों का तथा उनके साथ मन-बुद्धि का भी ’भान’ रखनेवाला ’मैं’ यही तो अपना आपा है, अपना स्वरूप है..! ’मेरा’ कह कर पहचाने गये इंद्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के साथ अपने जानने-समझने वाले ’स्व’ का तादात्म्य ही बन्धन है तथा इनसे रहित शुद्ध आत्मभान को, आत्मपरिचय को नित्य आत्मबोध के रूप में स्थिर करानेवाली विद्या ही आत्मविद्या है और उसे प्रदान करनेवाला ही हमारी परम्परा में ’गुरु’रूप में पूजनीय है।
हमारी गुरुपरम्परा के द्वारा प्रदत्त इस आत्मबोध में ’मानी हुई’ कोई बात नहीं है; किसीने कहा या किसी ग्रन्थ में लिखा है, इस आधार पर न तो अपने अस्तित्व को मानना पड़ता है और न ही सिद्ध करना होता है। शरीर-मन-बुद्धि के संघात को जाननेवाला, उनका संचालन करनेवाला तथा उनमें होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी रूप से भान होनेवाला ’मैं’ यह तो प्रत्येक का अपना अकाट्य अनुभव है तथा इस आत्मबोध में अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है... बस, "मैं हूँ" यह प्रत्येक का अनुभव ही स्वप्रमाण है।
भगवान् शंकराचार्य जी ने इसी आत्मभान तथा आत्मबोध के परिचायक के रूप में भगवान् सदाशिव के गुरुरूप श्री दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करते हुए इस आत्मभाव तथा आत्मबोध को ही परिलक्षित किया है...
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥
(बचपन आदि शारीरिक अवस्थाओं, जा्ग्रत आदि मानसिक अवस्थाओं और अन्य सभी अवस्थाओं में विद्यमान और उनसे वियुक्त (अलग), सदा ’मैं हूँ’ की स्फुरणा करने वाले अपने आत्मा को स्मरण करने पर जो भद्र मुद्रा के द्वारा प्रकट कर देते हैं, उन श्रीगुरुरूपी श्री दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है ॥"मेरे शरीर के लम्बे/नाटेपने, गोरे/कालेपने या मोटे/पतलेपने को जाननेवाला मैं हूँ" तथा "मुझे अपने मन के सुखी/दु:खीपने का भान होता है" के स्थान पर शरीर-मन के गुणधर्मों को अपने स्वयं पर लाद कर "मैं लम्बा/नाटा, गोरा/काला, मोटा/पतला तथा सुखी/दु:खी हूँ" मानना केवल भ्रम है और इस भ्रम का निराकरण करते हुए शरीर तथा मन की प्रत्येक अवस्था का भान मुझे है एवं उनमें होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन में भी मेरा स्वरूप अपरिवर्तनीय रूप से विद्यमान है" यह ठीक-ठीक समझ लेना तथा इस आत्मभान का ही अनुसंधान करना यही आत्मविद्या है, भारतीय अध्यात्मविद्या है..! प्रत्येक के इस स्वत:सिद्ध अनुभव को समझाने के लिये न किसी ग्रन्थ या पाठ्यक्रम की आवश्यकता है, न ही इसे सिद्ध करने के लिये किसी प्रयोगशाला की आवश्यकता है। "मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ" कहनेवाले सन्त कबीरदास जी भी इस अनुभव का बखान करते पाये जाते हैं। और इस आत्मभान में अनुभवविरुद्ध या तर्कविसंगत कुछ भी न होने से व्यवहार में बुद्धिवादी तथा विज्ञाननिष्ठ होने की डींग हाँकनेवाले भी अपने स्वयं के इस अनुभव को नकार नहीं सकते.. आस्तिक कसे जाने के भय से खुले मन से स्वीकार न पाये तो मौन हो जायेंगे, परन्तु शरीर से भिन्न अपने स्वयं के आत्मस्वरूप को नकार तो सकते नहीं..!!
ग्रन्थ, पाठ्यक्रम तथा प्रयोगों के आधार पर मिलनेवाली सभी जानकारी अपने ’स्व’ के अतिरिक्त अन्य किसी की होती है। सामान्य विद्यालयों में अध्यापकों के द्वारा ऐसी जानकारी ही दी जाती है, परन्तु इस प्रकार से प्राप्त जानकारी को भी समझने वाले मुझ ’स्वयं’ का अनुभव तो प्रत्येक को बिना किसी बाह्य जानकारी के ही होता है.... केवल उस शुद्ध आत्मस्वरूप का स्मरण भर कराना होता है। उपनिषद् तथा भगवद्गीता के "श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" तथा "ज्ञनिन: तत्त्वदर्शिन:" इन संकेतों के अनुसार गुरु का स्वयं शास्त्रनिष्ठ तथा आत्मानुभवसम्पन्न होना आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा विचार करते ही समझ में आनेवाले आत्मस्वरूप का भान देशकालादि के परे का स्थिर आत्मानुभव हो, इसलिये गुरु के द्वारा उपदिष्ट साधनापद्धति का सम्पादन भी इस क्रम में आवश्यक हो जाता है। स्वयं आत्मनिष्ठ होने से गुरु के पास वैसे साधनाक्रम के अनुसरण का भी अनुभव होता है... अत: वह इस अध्यात्मविद्या तथा साधनामार्ग के विषय में स्वानुभवसिद्ध मार्गदर्शन कर सकता है। साधक की मानसिक तथा बौद्धिक स्थिति तथा क्षमता के आधार पर गुरु उसे साधना के रूप में उपासना, ध्यान, कर्म आदि विभिन्न मार्गों में से किसी उचित मार्ग का उपदेश कर सकते हैं। विशिष्ट साधनामार्ग का क्रमबद्ध अनुसरण करने से अपने ’स्व’ के अनुभव की परिणति देशकालादि सीमाओं के पार असीम अखण्ड परमात्मसाक्षात्कार में होना ही आत्मविद्या का चरम लक्ष्य है।
आत्मस्वरूप का बोध तथा साधनापथ में मार्गदर्शन करानेवाला ही हमारी आर्ष आत्मविद्या का संवाहक ’गुरु’ है, उसके तथा अनादि काल से चली आ रही गुरुपरम्परा के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता की अभिव्यक्ति ही ’गुरुपूर्णिमा’ है...!
- स्वामीजी, गुरुपूर्णिमा २०१९