भारत के स्वतन्त्र होते ही नेहरू जी ने तथाकथित "वैज्ञानिक विचार" पर बल दिया और एक भारतीय परम्परा, इतिहास तथा हिन्दु आस्थाओं के विरुद्ध एक अभियान छेड़ा। परिणामत: नुरूल हसन, इरफ़ान हबीब, रोमिल्ला थापर जैसे निपट साम्यवादियों को विद्वान् तथा इतिहास के विशेषज्ञ घोषित कर नेहरू-गांधी परिवार के काँग्रेसी शासन ने दशकों तक उनकी लिखी सभी पुस्तकों को सन्दर्भग्रन्थों की मान्यता दी तथा इसी परम्परा के लोगों के द्वारा यहाँ के विद्यालयों/महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम के लिये इतिहास की पाठ्यपुस्तकें लिखवा लीं। परिणामत: आनेवाली पीढियों को शालेय अध्ययन के अन्तर्गत ही भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में अनास्था, सम्भवत: तिरस्कार, के संस्कार दिये गये। मगध के राजा अशोक के पूर्व का लगभग सारा इतिहास तो पुस्तकों से हटाया गया तथा अशोक के मन में कलिंग युद्ध में की अमानवीय हिंसा के पश्चात् उपजी तथाकथित अहिंसा को ही भारतीय संस्कृति का मानदण्ड बता कर पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से अहिंसा के नाम पर पौरुषहीन तथा पुरुषार्थहीन प्रतिक्रियाशून्यता का ही संस्कार विद्यार्थियों को दिया गया।
तत्पश्चात् का भारत का पूरा इतिहास कूड़ेदान में डाल कर बाबर से बहादुरशाह तक का लगभग ३५० वर्षों का कालखण्ड ही पाठ्यपुस्तकों में भारत का इतिहास बताया गया। उसमें भी सभी मुग़ल तथा तुर्की आक्रमणकारी आक्रान्ताओं के द्वारा यहाँ के समाज तथा संस्कृति पर किये गये सभी बर्बर अत्याचारों एवं अनन्वित दुराचारों को छिपा कर उन सभी को अपनी प्रजा के हितैषी, दयालु तथा उदारमना बता कर उनके कार्यकाल को ही भारत के स्वर्णिम युग के रूप में प्रस्तुत किया गया। ऐसा करते समय बादामी, वेंगी तथा कल्याणी के चालुक्य (लगभग ७०० वर्ष), पाण्ड्य (लगभग ७५० वर्ष), कलिंग, उड़ीसा से मलाया तथा जावा-सुमात्रा तक शासन करनेवाला चोल वंश (लगभग ५०० वर्ष), पल्लव (लगभग ६०० वर्ष), गुर्जर (लगभग ५०० वर्ष) तथा मुग़लों को असम आदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में घुसने न देने वाले अहोम (लगभग ६०० वर्ष) आदि राजवंशों का इतिहास तो पाठ्यपुस्तकों से सर्वथा हटा दिया गया। पल्लव, चोल, पाण्ड्य, होयसल, गुर्जर आदि राजवंशों के काल में पोषित तथा विकसित भारतीय नृत्य, नाट्य, संगीत, गायन, शिल्प आदि कलाओं को पाठ्यपुस्तकों में स्थान ही दिया जाने के कारण घृष्णेश्वर का कैलास मन्दिर, बृहदीश्वर मन्दिर, रामेश्वरम्, हलेबिडु आदि स्थानों के विशाल स्थापत्य तथा अद्भुत शिल्पकला के स्थान पर केवल मुग़लकाल में बने कब्रों को ही भारतीय संस्कृति तथा हिन्दु परम्पराओं के विरोधी इन साम्यवादी छद्म इतिहासकारों के द्वारा भारतीय स्थापत्य एवं शिल्प के रूप में अपनी पुस्तकों तथा शालेय पाठ्यपुस्तकों में प्रस्तुत किया गया। कत्थक, भरतनाट्यम्, कुचिपुडी आदि भारतीय नृत्यों तथा प्राचीनतम काल से चली आ रही स्वर-ताल पर आधारित गायनशैलियों के स्थान पर मुग़ल दरबारों तथा कोठों पर होनेवाला शृंगारिक नृत्य तथा गायन ही मानो इन छद्म इतिहासकारों की दृष्टि में भारतीय संगीत था।
यही स्थिति रामजन्मभूमि सम्बन्धित विवाद को लेकर रही। अंग्रेजों के काल के रेविन्यू रिकार्ड में "मस्ज़िद जन्मस्थान" ऐसा ही उल्लेख है, उसे इन छद्म इतिहासविज्ञों ने केवल "बाबरी मस्ज़िद" ही कहा तथा छ: दशकों तक भारत पर शासन करनेवाली काँग्रेस ने उस स्थान पर इतिहास में कभी किसी मन्दिर के होने की तथा उस मन्दिर को तोड़ कर ही बाबर के सरदार मीर बाकी के द्वारा मस्ज़िदनुमा भवन खड़ा किये जाने की बात को हमेशा नकारा। खैर, इस वर्ष देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस वाद का स्थायी निर्णय करने की ठान ली तथा लम्बे युक्तिवाद सुनने के बाद विवादित पूरी भूमि को "रामजन्मभूमि" स्वीकार कर उस स्थान पर केवल भव्य श्रीराममन्दिर बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनौ खण्डपीठ के तथा अन्तत: सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इतिहास के जानकारों के रूप में साक्ष्य प्रस्तुत करने समय इरफ़ान हबीब तथा रोमिल्ला थापर ने उस स्थान पर किसी भी प्राचीन मन्दिर के होने की सम्भावना को सिरे से नकार दिया था। यह बात भिन्न है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इन छद्म इतिहासकारों के मत को तथ्यों से विपरीत तथा काल्पनिक मान कर अस्वीकार कर दिया।
और अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार उस स्थान पर भव्य मन्दिर बनाने के कार्य के प्रथम चरण में वहाँ का मलबा हटा कर नींव की खुदाई प्रारम्भ हुई तब पहले ही दो दिनों में वहाँ लगभग ८०० वर्ष पुराने प्राचीन मन्दिर के अवशेष हाथ लगे हैं... खुदाई का कार्य पूरा होते होते वहाँ भूगर्भ में दबे पड़े न जाने ऐसे कितने और अवशेष निकल कर सामने आयेंगे..!परन्तु यह सबसे विश्वसनीय प्रमाण ही है कि नेहरू-गांधी परिवार की परम्परा के द्वारा पालित-पोषित ये सभी वामपंथी छद्म इतिहासकार सदा ही असत्य बताते रहे हैं।
आशा है कि कभी कोई शासन इस विषय में ठोस कदम उठा कर देश के विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में पढ़ाये जानेवाले पाठ्यपुस्तकों, विशेषत: इतिहास की पुस्तकों, में समूल परिवर्तन लाकर देश के वास्तविक इतिहास को अगली पीढ़ियों के हाथों में पाठ्यक्रम के रूप में सौंपेगा।
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चलते चलते..
और यह तो उस काल के स्थापत्य में प्रयुक्त गणित की एक झलक मात्र है... पूरे मन्दिर या भवन के निर्माण में प्रयुक्त वास्तुशास्त्र गणित की कैसी कैसी अद्भुत विशेषताओं से भरा होगा, यह तो केवल अनुमान का विषय है..!
तत्पश्चात् का भारत का पूरा इतिहास कूड़ेदान में डाल कर बाबर से बहादुरशाह तक का लगभग ३५० वर्षों का कालखण्ड ही पाठ्यपुस्तकों में भारत का इतिहास बताया गया। उसमें भी सभी मुग़ल तथा तुर्की आक्रमणकारी आक्रान्ताओं के द्वारा यहाँ के समाज तथा संस्कृति पर किये गये सभी बर्बर अत्याचारों एवं अनन्वित दुराचारों को छिपा कर उन सभी को अपनी प्रजा के हितैषी, दयालु तथा उदारमना बता कर उनके कार्यकाल को ही भारत के स्वर्णिम युग के रूप में प्रस्तुत किया गया। ऐसा करते समय बादामी, वेंगी तथा कल्याणी के चालुक्य (लगभग ७०० वर्ष), पाण्ड्य (लगभग ७५० वर्ष), कलिंग, उड़ीसा से मलाया तथा जावा-सुमात्रा तक शासन करनेवाला चोल वंश (लगभग ५०० वर्ष), पल्लव (लगभग ६०० वर्ष), गुर्जर (लगभग ५०० वर्ष) तथा मुग़लों को असम आदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में घुसने न देने वाले अहोम (लगभग ६०० वर्ष) आदि राजवंशों का इतिहास तो पाठ्यपुस्तकों से सर्वथा हटा दिया गया। पल्लव, चोल, पाण्ड्य, होयसल, गुर्जर आदि राजवंशों के काल में पोषित तथा विकसित भारतीय नृत्य, नाट्य, संगीत, गायन, शिल्प आदि कलाओं को पाठ्यपुस्तकों में स्थान ही दिया जाने के कारण घृष्णेश्वर का कैलास मन्दिर, बृहदीश्वर मन्दिर, रामेश्वरम्, हलेबिडु आदि स्थानों के विशाल स्थापत्य तथा अद्भुत शिल्पकला के स्थान पर केवल मुग़लकाल में बने कब्रों को ही भारतीय संस्कृति तथा हिन्दु परम्पराओं के विरोधी इन साम्यवादी छद्म इतिहासकारों के द्वारा भारतीय स्थापत्य एवं शिल्प के रूप में अपनी पुस्तकों तथा शालेय पाठ्यपुस्तकों में प्रस्तुत किया गया। कत्थक, भरतनाट्यम्, कुचिपुडी आदि भारतीय नृत्यों तथा प्राचीनतम काल से चली आ रही स्वर-ताल पर आधारित गायनशैलियों के स्थान पर मुग़ल दरबारों तथा कोठों पर होनेवाला शृंगारिक नृत्य तथा गायन ही मानो इन छद्म इतिहासकारों की दृष्टि में भारतीय संगीत था।
यही स्थिति रामजन्मभूमि सम्बन्धित विवाद को लेकर रही। अंग्रेजों के काल के रेविन्यू रिकार्ड में "मस्ज़िद जन्मस्थान" ऐसा ही उल्लेख है, उसे इन छद्म इतिहासविज्ञों ने केवल "बाबरी मस्ज़िद" ही कहा तथा छ: दशकों तक भारत पर शासन करनेवाली काँग्रेस ने उस स्थान पर इतिहास में कभी किसी मन्दिर के होने की तथा उस मन्दिर को तोड़ कर ही बाबर के सरदार मीर बाकी के द्वारा मस्ज़िदनुमा भवन खड़ा किये जाने की बात को हमेशा नकारा। खैर, इस वर्ष देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस वाद का स्थायी निर्णय करने की ठान ली तथा लम्बे युक्तिवाद सुनने के बाद विवादित पूरी भूमि को "रामजन्मभूमि" स्वीकार कर उस स्थान पर केवल भव्य श्रीराममन्दिर बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनौ खण्डपीठ के तथा अन्तत: सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इतिहास के जानकारों के रूप में साक्ष्य प्रस्तुत करने समय इरफ़ान हबीब तथा रोमिल्ला थापर ने उस स्थान पर किसी भी प्राचीन मन्दिर के होने की सम्भावना को सिरे से नकार दिया था। यह बात भिन्न है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इन छद्म इतिहासकारों के मत को तथ्यों से विपरीत तथा काल्पनिक मान कर अस्वीकार कर दिया।
और अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार उस स्थान पर भव्य मन्दिर बनाने के कार्य के प्रथम चरण में वहाँ का मलबा हटा कर नींव की खुदाई प्रारम्भ हुई तब पहले ही दो दिनों में वहाँ लगभग ८०० वर्ष पुराने प्राचीन मन्दिर के अवशेष हाथ लगे हैं... खुदाई का कार्य पूरा होते होते वहाँ भूगर्भ में दबे पड़े न जाने ऐसे कितने और अवशेष निकल कर सामने आयेंगे..!परन्तु यह सबसे विश्वसनीय प्रमाण ही है कि नेहरू-गांधी परिवार की परम्परा के द्वारा पालित-पोषित ये सभी वामपंथी छद्म इतिहासकार सदा ही असत्य बताते रहे हैं।
आशा है कि कभी कोई शासन इस विषय में ठोस कदम उठा कर देश के विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में पढ़ाये जानेवाले पाठ्यपुस्तकों, विशेषत: इतिहास की पुस्तकों, में समूल परिवर्तन लाकर देश के वास्तविक इतिहास को अगली पीढ़ियों के हाथों में पाठ्यक्रम के रूप में सौंपेगा।
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चलते चलते..
प्राचीन भारतीय सभ्यता की गणित तथा विज्ञान के क्षेत्रों की अपार क्षमता को नकार कर उन परम्पराओं की खिल्ली उड़ानेवाले समस्त आधुनिक विज्ञाननिष्ठों को अभी जन्मभूमि के स्थान पर भूगर्भ में मिला एक शिल्पखण्ड सहज रूप से चुनौती दे गया...
संलग्न चित्रों में शिला पर उत्कीर्ण कमल की आकृति को बारीकी से देखें... भीतरी गोल में बने कमलपुष्प की एक जैसी १३ पंखुड़ियाँ हैं तो बाहरी वृत्त में कमल की समान आकार की २९ पंखुड़ियाँ हैं। वैसे १३ तथा २९ दोनों "मूल संख्याएँ" हैं (उन्हें अन्य किसी भी संख्यासे पूरा भाग नहीं दिया जा सकता।) और वृत्त के ३६०° अंश भी १३ तथा २९ इन संख्याओं के द्वारा समान रूप से विभाजित नहीं हो सकते... ऐसे में कोई यह बतायें कि लगभग ८०० वर्ष पूर्व उस काल में ३६० अंशों के समान १३ तथा २९ भाग गणित की किस युक्ति के आधार पर किये गये होंगे, बगल-बगल की दो समान आकार की पंखुड़ियों में कितने अंशों का कोण है तथा वृत्ताकार कमल की १३ तथा २९ पंखुड़ियों को उस शिला पर इतने अचूक रूप में कैसे चित्रित किया गया होगा..? और हाँ, आजके विज्ञाननिष्ठ इन प्रश्नों का उत्तर निकालने के लिये कैलकुलेटर/कम्प्यूटर का प्रयोग न करें... इस शिल्प की निर्मिति के काल में यहाँ ऐसे उपकरण उपलब्ध नहीं थे...!और यह तो उस काल के स्थापत्य में प्रयुक्त गणित की एक झलक मात्र है... पूरे मन्दिर या भवन के निर्माण में प्रयुक्त वास्तुशास्त्र गणित की कैसी कैसी अद्भुत विशेषताओं से भरा होगा, यह तो केवल अनुमान का विषय है..!



